न समज पाऊ मैं अपने इस मन को ............
जब करे ये शैतानी तो लोग कहे हम को .................
मन तो है मन इस पर न चले जोर .........
पर फिर भी बड़ी कोशिस करता हु सम्भालने की इस मन को .....................
मन की है ये शाजिस की फसाये सदा हमको ...............
कर अपने मन की और मरवादे इस तन को .........
पहेचान है मुझे अपने इस मन की ......और दिल में है आस तुम्हे पाने की लेकिन होजाये कुछ गलत हमसे .........
तब याद आये इस मगज को .......................
इस कलयुग में है दिल फसा फसा सा पर साथ हो तुम तो क्या गम है इस मन को ........
मन चाहता है की कंही दूर चला जाऊ ....................
और वापिस आउ जब अपने मन को मैं जन जाऊ ...................
पर फिर याद आया की बहूत याद याद आती है अपनों की इस मन को ....................
कोशिस करता हु की भुलादु तुमको पर फिर याद आजाती है वो हर अदाए इस मन को ............................
नहीं हटा पाया मैं मन और जाल में फसता चला गया ...........
समझोता तो करा इस जिन्दगी से पर .........
फिर चोट बड़ी आई इस मन को.............................
रोता है ये मन मुझसे भी जादा , जब करना हो समझोता अपनों के मारे .........और कर भी लिया समजोता पर .....
फिर ये यादे नहीं टिकने देती है इस मन को ........................
अंत में .... :
मन तो है उस अंगद के पैर के समान जिसे हिला ना पाया कोई .................
और ये भी बिलकुल उसीके समान है जिसे हटा न पाया कोई ........
मेरी सोच कहती है की मैं भूल जाउ पछली बाते सारी .पर ...............
इस सोच पर हावी होने की आदत है इस मन को ............
धन्यवाद
