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Hansi, Harayana, India
these all poems are written by me...and my internal thinking

Thursday, January 27, 2011

बांग्वान आजके मात-पिता की

पहले   समा ऐसा था की उसमे समा जाने का जी  करता  था पर अब वही समा है जो एक शम्मा  की तरह  भुजता    नजर आ रहा है


मतलब आज की पीढ़ी और पहले की पीढ़ी में अंतर जो आज हर जगह  देखने   को मिलेगा .......................


कुछ इसही तरह  मेरे मन के विचार है जो इस कविता में है ........... 






आगया है ये  कैसा समा नर्क सा लगे अब तो जीना यंहा ,पहले कभी बच्चा  रोता था बाप की फटकार पर , लेकिन अब वही बेटा मरता है फटकार अपने बाप पर , जब तक था मनचाही  चीजों  का फेरा तो हे भगवन !मेरे बाप को लम्बी उम्र देना , वक्त के बित्ते 
वक्त बोला अब सम्भलो इन्हे पर बच्चे कहते है हे भगवन ! अब तो उठालो  इन्हे ...................................
माँ बाप ने पेट  कटा खुशियों  से अपने लालो के लिए पर अब बच्चे गिनते है की कितना खर्चा है इनके इलाजो के लिए,
हम भी है बच्चे किसीके ,और किसी समय होंगे मात-पिता किसीके ......तो जैसा दोगे दुःख -पे - दुःख इन्हे उतने ही तुम भी पाओगे  दुःख के पहाड़ चीने.........................................................




अंत हमेसा पक्ष में मेरा है फिर चाहे जमना कहे मुझे ये वेला है ,जैसा करो वैसा भरो , सुना कितना .......फिर भी रहना  वैसा चाहे कहे कोई कितना ,गिरोगे किसी दिन ओंधे मुह तब आएगा रोना तुम्हे कितना ................






अंत में एक और बात ....जीना है तो जियो जी भर के - जीना है तो जियो जी भर के  पर मात-पिता के चरणों  से नहीं दूर हटके  


                                            धन्यवाद 

Tuesday, January 25, 2011

ऐ हवा ऐ हवा






एक दुःख से भरी कविता हवा के विषय में , पहले हवा और आज की हवा के बीच अंतर करते हुए अपने दिल के विचार मैं प्रस्तुत करता हूँ ......................................................

ऐ हवा ऐ हवा तू क्यों हो गयी है खफा ,ऐ हवा ऐ हवा तू क्यों हो गयी है खफा,
तेरी मिठास व् शीतलता गयी है कँहा ,तेरे से ही चल रहा था जीवन सुन्दर सुखमय

सारा तेरे से ही चल रहा था जीवन सुन्दर सुखमय सारा ,पर अब तेरे खोने से हो गया है जन जीवन दुखमय सारा -पर अब तेरे खोने से हो गया है जन जीवन दुखमय सारा,

तेरी प्यारी सुगंध करती थी मोहित हमे- तेरी प्यारी सुगंध करती थी मोहित हमे

,पर अब क्यों भर देती है इस तन को कष्टों से सारा , तेरे साथी है ये पेड़- पोधे

प्यारे , लेकिन ये भी नहीं रहे किसी के सहारे ,न हमारे - न तुम्हारे ,एक हम ही इस दुःख का कारण है , जो दिन-ब-दिन हैवान बने एक हम ही इस दुःख का कारण है , जो दिन-ब-दिन हैवान बने, चाहे हम कितने आन्दोलन करके बचाले इन्हे , पर इन अनंत ;आपार उद्योगों पर काबू कोंन करे , कर -कर के थक गए हम , अगर रहा इस तरह से जन जीवन सारा , तो रह गया है अब इस धरती पे जीवन कुछ दिन का सारा ................. अंत में मैं कहता हु ऐ हवा -ऐ हवा , अगर मैं कर सकू तुझे फिर से पहले जेसा तो ,कोई गम नहीं फिर तो चाहे लग जाये मेरा जीवन सारा .......................................


                                                          धन्यवाद




































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