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Hansi, Harayana, India
these all poems are written by me...and my internal thinking

Monday, February 21, 2011

रे रोशनी (नेत्र हीनो के पक्ष में )




रे रोशनी चले साथ सदा तेरे हम ..........
जब थमे तू रात को तेरे साथ ही थमे हम .........
हमे हुई तू  प्राप्त ये है वरदान बड़ा हमारा  ..पर जिसके नेत्रों से है वंचित 
तू उसके है सरे सुने पल .......



तुझ से ही है जनजीवन सारा और हम .....
चले हम सब बिन चाबी के पर फिर भी चाहिये रोशनी का  का सहारा     और मन  का दम....  हमे तो तू मिली उस दाता से पर फिर भी कुछ लोग है वंचित इस अमृत से .......जिनसे अनजान है हम ........


क्यों है सजा ये क्या खता है इनकी हमे मिली ख़ुशी इन्हें क्यों मिला गम .........
चलते चलते कहे हम ,उल्ल्हस से भरके कहे हम  .की क्या नजारा है ये कुदरत का .............पर 

 वो भी हैं बेचारे जो कहे की ....कैसे लगे हैं  हम ? ........

हे भगवन मेरी है आपसे यही विनती की जो है पृथ्वी पर नेत्रहीन उन सबको दे कुछ दुनिया से अलग दम-ख़म ....
हमे तो दिया तुने सबसे बड़ा रत्न .......
इनको भी दे कोई ऐसा यत्न जिनसे ये जी सके जिन्दगी में हर सुख के पल ....पल .......पल 

धन्यवाद ... 

Friday, February 18, 2011

यांदे





ये ऑंखें नम  हो  जाती हैं .........................जब याद तुम्हारी आती है ,

ये तन है , सिर्फ   अपनों की चाहत  का मारा जभी तो दर्द में अपनों की याद आती है  ...............
अब कम है प्यार ........नफरत है ज्यादा पर फिर भी याद तुम्हारी सताती है .........

दिन के उज्याले में तुम्हे ढूंडा .., रात में चाँद की रौशनी में तुम्हे ढूंडा पर जितनी ,........कोशिस करता हूँ 
तुम्हे  पाने  की उतनी ही मेरी दिल की धडकन भडती जाती है ..............  याद में तो वो   ताकत है की दो दिल करीब ले आती है .........लगता है दम तोड़ देंगे हम तुम्हारी याद में ............
ये  हमे   समय की तेज़ रफ्तार बताती है ...................


बाकि चाहे हम भूल जाएँ   आपको ................... लेकिन फिर भी कभी -कभी इन आँखों में परछाई तुम्हारी बन आती है ..................



                                           धन्यवाद .... 







Wednesday, February 16, 2011

जीवन की सात अव्स्ताएँ

क्या  आप जीवन की सात अव्स्ताएँ से परिचित है ? मेरी  गुस्ताकी माफ़ 
करना ये विषय माननीय विल्लिं शेक्स्पीअर  सर का चर्चित करा हु है पर मैं इस बात पर सिर्फ आपने विचार रख रहा हु .........मुझे पता है की मैं उनके  के सामने एक रेत के जर्रे समान हूँ  .........उन्हों ने कितनी कविता  लिखी और कितनी ही कहानियाँ  लिखी .........भगवान उनकी आत्मा को शांति दे .....मैं तो उनको पूजता हूँ .........बस मैं कविता अपनी भाषा हिंदी में लिखता हूँ और वे अंग्रेजी में लिखते थे ................तो मैं अपने विचार रखता हु.... क्या लगता है जीवन की अव्स्ताएँ सात  होती है   ? मैं तो सोचता हूँ जीवन की कोई अवस्ता ही नहीं होती ................ये कथ्य मैं आज के युग को देख कर बोलरहा हूँ .......क्यूकि आज पहेले बच्चे का जन्म नहीं होता लेकिन  उसकी रोजगारी की तयारी पहेले  कर देते है.....//  शेक्स्पीअर सर के हिसाब से जीवन की सात अव्स्ताएँ कुछ इस तरह है .........................
                                     
                                             1. Infancy
                                             2. childhood
                                             3. Lover
                                             4. Solider 
                                             5. Justice 
                                             6. Old age
                                             7. Dementia and death 
लेकिन मैं सोचता हूँ की जीवन अब एक आने - जाने वाले उस यात्री की तरह हो गयी है जो एक एक जगह से दूसरी जगह जाता रहता है  जिसे अपने लिए कुछ  समय भी नहीं मिलता जिससे वो  अपने जीवन को  जी भरके जी सके .......उसकी कोई  भी अवस्था हो वो सिर्फ  काम  में लगा रहता है ...और ये    आज के युग के कारण है ...............सभी  बूढ़े से लेकर जवान तक आज कमाई में लगे पड़े है ........कुछ आज इस मानव की स्थिति इस माया ने बिगड़ दी है जिस कारण वो न तो अपनी सेहत का ख्याल रख पते हैं  और नहीं अपनों का  प्यार ले पाते  हैं  .................
                                             

Monday, February 14, 2011




Please conserve our rain water to take some steps .................
If we control on water harvesting so it is of our benefit so think about it and see some step to control and save our greeny nature from site         www.singh786best.weebly.com 

Sunday, February 13, 2011

कोई अपना ही ...

                                                              कोई अपना ही ...



जिन्दगी एक नव में बैठा नाविक है ,जो हमे एक पार से दूसरे पार लगाता है. जिन्दगी माँ बाप की सेवा है ,जो हमे प्रेम का घूंट पिलाता है .वैसे देखा जाये तो जिन्दगी का अपना खुदका कोई अस्तित्व नहीं पर  जिन्दगी का अस्तित्व कोई अपना ही बनाता है ...............................


जिन्दगी में हम कभी कुछ हासिल नहीं कर सकते ,जब तक कोई  अपना जोर नहीं लगाता है . मन की चंचलता है हवा के समान ,जो इस जिन्दगी को इस जनहान में फैलता है यूँ तो मन भटक जाता है काले घनघोर जंगलो में ,पर  दोबारा से इस जिन्दगी में वापिस ,कोई अपना ही लाता है ............

ये लम्बी -लम्बी राहें जो लगती है , कभी कभी सुनी ,पर इन राहों को  जन्नत कोई अपना ही बनाता है . अपना .........................कोंन  है अपना ? कोई नहीं आज  किसी का पर जब टूट पड़े उस पर मुसीबतों का पहाड़ तब वही अपना अपनों को याद आता है ...आखिर  अपना तो अपना ही है तो चाहे वो अपना सपना ही क्यों  ना हो .वैस तो हम सपने देखते है  खूब  पर दूसरे के सपने को अपना सपना समझ कर साकार कोई अपना ही बनाता है ............................................आखिर में मैं कहता हूँ की आज नहीं रहा अपना पन  कहीं पर फिर भी अपना तो हमेशा हमे बहुत याद आता है ................


                                                         धन्यवाद   




ये  विज्ञापन काफी हद तक  एक काल्पनिक है  लेकिन आज की पीढ़ी को देख ते हुए  हमारे  आने वाले वक्त में एक आस्लिय्त बनने वाली है ........................................ मैं तो इस विज्ञापन से काफी प्रभावित  हुआ  और आप ......देखने के लिए क्लिक करे


                                                          धन्यवाद ........................

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