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Hansi, Harayana, India
these all poems are written by me...and my internal thinking

Wednesday, June 8, 2011

" मैं " मेरी









"  मैं "    मेरी मुझको ही  चढ़ाती है और यही मुझ को गिराती है  
मन को तो है मचलने की आदत्त पर मुझे मेरी आत्मा ही हर गलत और सही समझाती  है ,
जब मैं   कुछ गलत करता  हु  तब किसी का होश नहीं होता और न साथ ,
पर उस समय सिर्फ मेरी  आत्मा ही मेरी  रूह  को हिलाती है,  
तब मैं   जगता   हु   और उसी वक्त मेरी पलके गिर आती है 

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