" मैं " मेरी मुझको ही चढ़ाती है और यही मुझ को गिराती है
मन को तो है मचलने की आदत्त पर मुझे मेरी आत्मा ही हर गलत और सही समझाती है ,
जब मैं कुछ गलत करता हु तब किसी का होश नहीं होता और न साथ ,
पर उस समय सिर्फ मेरी आत्मा ही मेरी रूह को हिलाती है,
तब मैं जगता हु और उसी वक्त मेरी पलके गिर आती है
Sunder Abhivykti....
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