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Hansi, Harayana, India
these all poems are written by me...and my internal thinking

Friday, June 10, 2011

कोई अपना ही ...

 
 
 
जिन्दगी एक नव में बैठा नाविक है ,जो हमे एक पार से दूसरे पार लगाता है. जिन्दगी माँ बाप की सेवा है ,जो हमे प्रेम का घूंट पिलाता है .वैसे देखा जाये तो जिन्दगी का अपना खुदका कोई अस्तित्व नहीं पर  जिन्दगी का अस्तित्व कोई अपना ही बनाता है ...............................


जिन्दगी में हम कभी कुछ हासिल नहीं कर सकते ,जब तक कोई  अपना जोर नहीं लगाता है . मन की चंचलता है हवा के समान ,जो इस जिन्दगी को इस जनहान में फैलता है यूँ तो मन भटक जाता है काले घनघोर जंगलो में ,पर  दोबारा से इस जिन्दगी में वापिस ,कोई अपना ही लाता है ............

ये लम्बी -लम्बी राहें जो लगती है , कभी कभी सुनी ,पर इन राहों को  जन्नत कोई अपना ही बनाता है . अपना .........................कोंन  है अपना ? कोई नहीं आज  किसी का पर जब टूट पड़े उस पर मुसीबतों का पहाड़ तब वही अपना अपनों को याद आता है ...आखिर  अपना तो अपना ही है तो चाहे वो अपना सपना ही क्यों  ना हो .वैस तो हम सपने देखते है  खूब  पर दूसरे के सपने को अपना सपना समझ कर साकार कोई अपना ही बनाता है ............................................आखिर में मैं कहता हूँ की आज नहीं रहा अपना पन  कहीं पर फिर भी अपना तो हमेशा हमे बहुत याद आता है ................


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